ईसरो वैज्ञानिकों के सम्मान में प्रस्तुत है दिव्यांग भाई की एक कविता

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दिव्यांग भाई की एक नई कविता आप तक पहुंचा रहा हूं। आशा है आपको पसंद आएगी।
हमारे परम सम्माननीय इसरो वैज्ञानिकों के सम्मान में है एवं हमारे पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान को एक संदेश भी दिया जा रहा है, क्योंकि वह हमारे सम्माननीय वैज्ञानिकों की इस क्षणिक असफलता का मजाक उड़ाने में तुला हैं, जबकि पूरी दुनिया इस कार्य को एक सकारात्मक कदम बता रही है।

हम ताज हैं भारत माता के, ना डरते हम बाधाओं से,

क्षणिक निराशा से क्या होता, हम सागर आशाओं के।

उद्देश्यों को हासिल करने, नित-नित बढ़ते रहते हम,
फतेह प्राप्त कर भारत मां का, लहरा देते हैं परचम।


चंद्र मिशन क्या, हमने तो मंगल पर पांव पसारे हैं,
एक चुनौती को लेकर के, कभी नहीं हम हारे हैं।


निश्चित फल देने वाले हम, पुष्प हैं उन शाखाओं के,
क्षणिक निराशा से क्या होता, हम सागर आशाओं के।

ओ ढीठ पाक नेताओं सुनलो, तुम हमसे क्यों जलते हो?
तुम हमसे क्या टक्कर लोगे, तुम विदेश से पलते हो।


धरती पर चलना नईं आता, तुम नभ में क्या जाओगे,
होंगे हम ब्रह्मांड विजेता, तुम तो धूल न पाओगे।


हम बहते-रहते सदैव, सम निर्मल जल धाराओं-से,
क्षणिक निराशा से क्या होता, हम सागर आशाओं के।

रचनाकार-जय हिंद वंशकार
( शुभप्रभातम् संस्था युवा दल अध्यक्ष)
नोटा
झांसी
उत्तर प्रदेश

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